झारखंड में 35,000 पेड़ काट दिए… अब बताइए, तोते कहाँ जाएंगे?जंगल कटेंगे तो जानवर शहरों में ही आएंगे
देश में विकास और पर्यावरण के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है, लेकिन झारखंड की कारों ओपन कास्ट कोयला परियोजना में प्रस्तावित लगभग 35,000 पेड़ों की कटाई ने इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। सवाल सिर्फ पेड़ों का नहीं है, सवाल है वन्यजीवों के अस्तित्व, स्थानीय लोगों के जीवन, और पर्यावरणीय संतुलन का।
एक पेड़ उगने में दशकों लगते हैं, लेकिन उसे काटने में कुछ मिनट। अगर 35,000 पेड़ काट दिए जाएँ, तो उनकी भरपाई में 35 साल भी कम पड़ सकते हैं—वो भी तब, जब पौधे जीवित रह पाएँ।
35,000 पेड़: सिर्फ संख्या नहीं, पूरा इकोसिस्टम
पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होते। हर पेड़ के साथ जुड़ा होता है:
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पक्षियों का घोंसला
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सरीसृपों और छोटे जीवों का आवास
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मिट्टी की पकड़
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जल संरक्षण
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स्थानीय तापमान संतुलन
1,000 पेड़ों की कटाई से ही असंख्य जीव प्रभावित होते हैं, तो 35,000 पेड़ों की कटाई का मतलब है पूरे जंगल के इकोसिस्टम का टूट जाना।
तोते, बंदर, हिरण, कीड़े-मकोड़े, सांप, पक्षी—ये सब कहाँ जाएँगे?
क्या कोयला इतना ज़रूरी है कि हम हर जीवन को कुर्बान कर दें?
अनुमति कैसे मिल जाती है?
यह सवाल सबसे बड़ा है।
पेड़ काटने की अनुमति सिर्फ राज्य सरकार नहीं देती—
इसमें शामिल होते हैं:
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राज्य सरकार
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केंद्र सरकार
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वन विभाग
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पर्यावरण मंत्रालय
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NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल)
फिर भी इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को क्लीयरेंस मिल जाना आम नागरिक के लिए हैरान करने वाला है।
क्या पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन (EIA) वास्तव में निष्पक्ष होता है?
क्या स्थानीय लोगों की सहमति ली जाती है?
या फिर विकास के नाम पर सब कुछ “रूटीन प्रोसेस” बन चुका है
🌳 35,000 पेड़ काट दिए… अब बताइए, तोते कहाँ जाएंगे?झारखंड
🐆 आज लेपर्ड मुंबई में है, कल आपके दरवाज़े पर होगा
आज झारखंड में 35,000 पेड़ काटे जा रहे हैं।
हाँ, पूरे पैंतीस हज़ार।
कोई गलती नहीं है इस नंबर में।
अब ज़रा रुकिए…
एक पेड़ उगने में 20–30 साल लगते हैं।
35,000 पेड़ उगाने में 35 साल भी कम पड़ जाएंगे।
लेकिन काटने में?
कुछ मशीनें, कुछ काग़ज़, कुछ परमिशन…
और जंगल साफ।


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