“जमानत नहीं, तारीख़ पर तारीख़: anil mishra केस में हाईकोर्ट सख़्त, सरकार पर उठे गंभीर सवाल”4 jan2026

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“जमानत नहीं, तारीख़ पर तारीख़”: अनिल मिश्रा (anil mishra) गिरफ्तारी केस में हाईकोर्ट की सख्ती, सरकार की रणनीति और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल

ग्वालियर | 4 जनवरी 2026 | विशेष रिपोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में एडवोकेट अनिल मिश्रा (anil mishra) केस की गिरफ्तारी से जुड़े मामले की सुनवाई एक बार फिर बिना किसी अंतिम राहत के टल गई। बुधवार को हुई सुनवाई के बाद भी न तो जमानत मिली, न ही सरकार कोई ठोस जवाब पेश कर पाई। इसके बजाय, अदालत ने जिस तरह से राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन और अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए—वह इस केस को एक साधारण गिरफ्तारी से कहीं आगे ले जाता है।

यह मामला अब केवल एक वकील की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह न्यायपालिका बनाम सत्ता, कानून बनाम राजनीतिक दबाव, और पुलिस बनाम संवैधानिक प्रक्रिया का प्रतीक बनता जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

3 जनवरी की रात ही इस केस के संकेत मिल गए थे कि अगली सुनवाई भी निर्णायक नहीं होगी। 4 जनवरी को हुई सुनवाई में वही हुआ जिसकी आशंका जताई जा रही थी—सरकार ने फिर से समय मांगा।

यह मामला SC/ST एक्ट से जुड़ा है, और इसी कानून के तकनीकी प्रावधानों ने पूरी सुनवाई की दिशा ही बदल दी।

डिवीजन बेंच में क्या हुआ?

ग्वालियर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने जब मामला आया, तो कोर्ट का पहला सवाल सीधा था—

“राज्य सरकार ने जो जवाब देने का समय मांगा था, वह जवाब कहां है?”

इस पर सरकार की ओर से कोई ठोस दस्तावेज़ी उत्तर पेश नहीं किया गया।

इसी दौरान महाधिवक्ता (Advocate General) स्वयं कोर्ट में उपस्थित हुए। यह अपने आप में संकेत था कि सरकार इस मामले को कितनी गंभीरता—या कहें कि राजनीतिक स्तर पर कितनी मजबूरी—से ले रही है।

महाधिवक्ता की रणनीति: बहस नहीं, खामी खोजो

महाधिवक्ता ने बहस में उलझने के बजाय याचिका में तकनीकी कमी निकालने का रास्ता चुना।

उनका तर्क था—

  • मामला SC/ST एक्ट से संबंधित है

  • सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट रूलिंग है कि

    ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता (Complainant) को सुने बिना कोई राहत नहीं दी जा सकती

  • जबकि इस केस में शिकायतकर्ता को नोटिस ही नहीं दिया गया

यानी पूरी याचिका की सुनवाई ही प्रक्रियात्मक रूप से अधूरी है।

हाईकोर्ट में बड़ा मोड़: अनिल मिश्रा(anil mishra) केस में जमानत टली, पुलिस और सरकार की भूमिका पर सवाल”anil mishra case

महाधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले
AIR SC 5601 – सत्यानारायण बनाम हीराराम भूमिवाला
का हवाला देते हुए कहा—

“Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act में यह अभियोजन पक्ष का कर्तव्य है कि शिकायतकर्ता को हर स्तर पर सूचना दी जाए।”

यह तर्क अदालत के सामने मजबूत था।

कोर्ट का रुख: ‘हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ऊपर नहीं’

डिवीजन बेंच ने साफ शब्दों में कहा—

“जब सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग मौजूद है, तो हाईकोर्ट उसकी अनदेखी नहीं कर सकता।”

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—

  • शिकायतकर्ता से जवाब मांगना जरूरी नहीं

  • लेकिन याचिका की कॉपी शिकायतकर्ता को सर्व करना अनिवार्य है

    अदालत का आदेश: 2 बजे तक कॉपी सर्व करो

    कोर्ट ने निर्देश दिया—

    “ग्वालियर के पुलिस अधीक्षक यह सुनिश्चित करें कि याचिका की प्रति शिकायतकर्ता को आज दोपहर 2:00 बजे तक सर्व कर दी जाए।”

    यहीं से यह मामला एक नई बहस में बदल गया।

    “भगोड़ा शिकायतकर्ता, लेकिन जेल में वकील: अनिल मिश्रा(anil mishra) केस में न्याय व्यवस्था पर सवाल”सबसे बड़ा सवाल:

  •  भगोड़े को नोटिस कैसे मिलेगा?

    जिस शिकायतकर्ता की बात हो रही है—

    • वह वांछित (Wanted) है

    • उसके खिलाफ वारंट जारी है

    • वह महीनों से फरार बताया जा रहा है

    लेकिन हैरानी की बात यह है कि—

    • वही व्यक्ति SP ऑफिस पहुंचकर FIR दर्ज कराता है

    • FIR की कॉपी लेकर आसानी से चला जाता है

    • पुलिस उसे “नोटिस सर्व” नहीं कर पा रही

    यह विरोधाभास अदालत में भी उठा।

    जस्टिस ने स्पष्ट कहा—

    1. घर जाकर सर्व करें

    2. परिवार के सदस्य को दें

    3. लेने से मना करे तो चस्पा करें

    4. व्हाट्सएप पर भेजें

    5. सोशल मीडिया प्रोफाइल पर सर्व करें

    “इनमें से कोई भी तरीका अपनाइए, हम मान लेंगे कि नोटिस सर्व हो गया।”

    पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल

    यहीं से पुलिस प्रशासन कटघरे में आ गया।

    • जो व्यक्ति महीनों से “मिल नहीं रहा”

    • वही व्यक्ति CSP के साथ फोटो खिंचवाता है

    • शादियों में जाता है

    • सोशल मीडिया पर सक्रिय है

    फिर सवाल उठता है—

    क्या कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है?

    कोर्ट रूम के बाहर चर्चा यह रही कि—

    “ऊपर से आदेश है—किसी भी हालत में छूटना नहीं चाहिए।”

    यानी यह केस अब कानूनी से ज़्यादा राजनीतिक प्रतिष्ठा का मुद्दा बन चुका है।

    anil mishraअनिल मिश्रा को जमानत क्यों नहीं मिली?

    सीधा जवाब—

    👉 तकनीकी कारणों से

    जब तक—

    • शिकायतकर्ता को कॉपी सर्व नहीं होती

    • कोर्ट की प्रक्रिया पूरी नहीं होती

    तब तक—

    • जमानत पर फैसला संभव नहीं

      क्या यह सिर्फ अनिल मिश्रा का मामला है?

      नहीं।

      यह मामला दर्शाता है—

      • कैसे कानून का इस्तेमाल दबाव के औज़ार के रूप में हो सकता है

      • कैसे पुलिस चयनात्मक सक्रियता दिखा सकती है

      • और कैसे अदालत ही आखिरी संतुलन बनकर सामने आती है

        अदालत बनाम व्यवस्था

        इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित किया—

        जहां पुलिस की दादागिरी खत्म होती है, वहीं से कोर्ट का दरवाज़ा शुरू होता है।

        आज जमानत नहीं मिली।
        आज भी तारीख लगी।

        लेकिन जिस तरह से अदालत ने सरकार और पुलिस को कानूनी दायरे में लौटने पर मजबूर किया है—वह आने वाले दिनों में इस केस को निर्णायक मोड़ तक जरूर ले जाएगा।

      • (यह रिपोर्ट अदालत की कार्यवाही, उपलब्ध दस्तावेज़ों और सार्वजनिक तथ्यों पर आधारित है। मामला न्यायालय में विचाराधीन है।)

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